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SURYAKANT MAJALKAR

Abstract

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SURYAKANT MAJALKAR

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तुजसा

तुजसा

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कोई तुजसा मुझमें समा गया है,
ये दिल तेरेलिए सोचने लगा है,
प्यारा सा दिल में मना कैसे करु?
वो मुझको मुझे से चुराने लगा है,
जिद्दी है, नादान है, नटखट है,
साथ हरपल मेरा निभाने लगा है,
इसीके सहारे जिंदा हू अबतक,
मुझे तेरी जिंदगी बनाने चला है।
©सुर्यांश


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