STORYMIRROR

SURYAKANT MAJALKAR

Abstract

4  

SURYAKANT MAJALKAR

Abstract

तुजसा

तुजसा

1 min
11

कोई तुजसा मुझमें समा गया है,
ये दिल तेरेलिए सोचने लगा है,
प्यारा सा दिल में मना कैसे करु?
वो मुझको मुझे से चुराने लगा है,
जिद्दी है, नादान है, नटखट है,
साथ हरपल मेरा निभाने लगा है,
इसीके सहारे जिंदा हू अबतक,
मुझे तेरी जिंदगी बनाने चला है।
©सुर्यांश


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract