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ca. Ratan Kumar Agarwala

Abstract Tragedy

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ca. Ratan Kumar Agarwala

Abstract Tragedy

हाँ मैं एक पिता हूँ

हाँ मैं एक पिता हूँ

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हाँ मैं एक पिता हूँ,

जिम्मेदारियों के तले झुका हुआ

थका हुआ हूँ पर रुक नहीं सकता

क्यूँ कि अभी तो बहुत जिम्मेदारियाँ बाकी है

काफी अपेक्षाएं हैं परिवार को मुझसे

क्या हुआ जो थोड़ी सी थकान हो गई तो

सभी थकते हैं इस दुनिया में

कुछ काम करके, और कुछ बिना काम किये

लेकिन मुझे रुकने का हक़ नहीं

क्योंकि मैं एक पिता हूँ।

 

चेहरे पर एक बेदाग सी खुशी

हरदम खुशमिजाज सा दिखने वाला,

सारा ग़म मन में दबाये हुए

बाहर एक अलग ही शख्सियत,

अंदर से कुछ घुटा घुटा सा, कुछ लुटा लुटा सा,

पर बाहर बिलकुल अलग, बिलकुल दुरुस्त,

मानों सब कुछ सही सलामत हो

जी हाँ सब कुछ,

बिना किसी मिलावट,

बिना किसी बनावट।

 

क्या कहते हैं सब कि

मुझे रोने का भी हक़ नहीं

हाँ जानता हूँ मैं कि पिता हूँ

और इस बात का मुझे कोई शक नहीं

पर मेरे अहसास?

क्या उनका कोई मोल नहीं?

मैं भी रोना चाहता हूँ किसी के कंधे पर मत्था टिका कर

मुझे भी तो थोड़ा वक़्त चाहिए खुद के लिए

जिम्मेदारियों से चाहिए मुक्ति

60 का होने को आया

सोचा था आराम करने का अवसर मिलेगा

पर कहाँ?

जिम्मेदारियों से छुटकारा मिले तब तो

साँसे लूँ खुद के संग खुद के लम्हों के बीच।

 

पर कैसे हो यह सब?

अभी तो बच्चों की शादी करनी है

उनका घर बसाना है

हाँ थोड़ी थकान तो हो रही है

पाँव भी लड़खड़ाते हैं

पर रुकूँ भी तो कैसे?

उफ़ ये जिम्मेदारियाँ!


“अजी, सुनते हो, राशन ख़त्म हो गया”

“गैस का सिलिंडर बुक कराया क्या ?”

“पापा, कॉलेज की फीस देनी है”

“पापा, डिश टीवी के रिन्यूअल की तारीख आज है”

“पापा, मेरा मोबाइल चोरी हो गया”

“पापा लैपटॉप की बैटरी चार्ज नहीं होती”

“पापा, इस बार दीवाली में नई गाड़ी ले लो ना”

“पापा ये, पापा वो, पापा………..“

बस इन्हीं में उलझा हुआ हूँ,

क्या करूँ, मैं पिता हूँ ?

 हाँ, मैं एक पिता हूँ।


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