नम्रता सिंह नमी
Tragedy
गुमनामी के अंधेरों से निकल कर
कुछ खवाब चले थे मंज़िल की ओर
दुनिया की मुश्किलात ने
उनका कत्ल कर दिया।
मिठास
चाँद
लकीरे
भीड़
बेतरतीब
अनजाने कंधे
सांस
गुमनाम मौत
बंदी
भाव
तमस की गुहा में क्यों, स्त्रियाँ अब जल रहीं। तमस की गुहा में क्यों, स्त्रियाँ अब जल रहीं।
अब अकेले तय न होगा यह दुःख भरा जीवन का सफ़र। अब अकेले तय न होगा यह दुःख भरा जीवन का सफ़र।
कुछ टूट रहा था, कुछ छूट रहा था, लेखन से नाता टूट रहा था। कुछ टूट रहा था, कुछ छूट रहा था, लेखन से नाता टूट रहा था।
अजी नौकरी का भी अपना मज़ा है। जहां अपनी चलती नही कुछ रज़ा है। अजी नौकरी का भी अपना मज़ा है। जहां अपनी चलती नही कुछ रज़ा है।
अथाह स्वेद बहाती है। अपनी जठराग्नि बुझाती है।। अथाह स्वेद बहाती है। अपनी जठराग्नि बुझाती है।।
गज़ब गज़ब की बातें सुनी है उन्ही बातों में एक खास बात सुनी। गज़ब गज़ब की बातें सुनी है उन्ही बातों में एक खास बात सुनी।
नौजवान गुमराह हो रहे । दूसरों के इशारों पर अपनों को ही लूट रहे । नौजवान गुमराह हो रहे । दूसरों के इशारों पर अपनों को ही लूट रहे ।
वो अतीत की काली परछाई पल पल मन को दुखी कर जाती। वो अतीत की काली परछाई पल पल मन को दुखी कर जाती।
दूर कहीं दिख रहा था एक अस्थि पिंजर, जिस पर रह गया था बस मॉंस चिपक कर। दूर कहीं दिख रहा था एक अस्थि पिंजर, जिस पर रह गया था बस मॉंस चिपक कर।
चीखती नदी मौन प्रार्थना में लीन हो जाती है। चीखती नदी मौन प्रार्थना में लीन हो जाती है।
मम्मी मैं क्या सच मे मर गई हूं जो आप लोग मेरे सारे कपड़े खुशी को देने चले गए थे ? मम्मी मैं क्या सच मे मर गई हूं जो आप लोग मेरे सारे कपड़े खुशी को देने चले गए थे ?
एकांत से घिरा, फिर भी साथी हूँ सबका, खुद को पहचानने का, यह अद्भुत सफर। एकांत से घिरा, फिर भी साथी हूँ सबका, खुद को पहचानने का, यह अद्भुत सफर।
राजनीति के खेल में क्या हार क्या जीत ; ना कोई शत्रु यहां और ना यहां कोई मीत ! राजनीति के खेल में क्या हार क्या जीत ; ना कोई शत्रु यहां और ना यहां कोई मीत !
माँ ने अपनी कृपा प्रसाद से मुझे भरपूर अभिभूत कर दिया। माँ ने अपनी कृपा प्रसाद से मुझे भरपूर अभिभूत कर दिया।
मेरे हिंदू मुस्लिम बच्चों को आपस में लड़ाया जाता है मेरे हिंदू मुस्लिम बच्चों को आपस में लड़ाया जाता है
इक दुबला पतला सा पेड़ था, चंद टहनियां चंद पत्ते थे। इक दुबला पतला सा पेड़ था, चंद टहनियां चंद पत्ते थे।
कहने लगा, "फर्ज़ अदा करने की सज़ा मिली है एक बाप को।" कहने लगा, "फर्ज़ अदा करने की सज़ा मिली है एक बाप को।"
शिकायत थी उनकी कि हम उन्हें मिलते नहीं। तो बन के खुशबू उनके बदन की महका जाये। शिकायत थी उनकी कि हम उन्हें मिलते नहीं। तो बन के खुशबू उनके बदन की महका जाये।
है कितना क्षण भंगुर यह जीवन, अगले पल का पता नहीं। है कितना क्षण भंगुर यह जीवन, अगले पल का पता नहीं।
धरती ऐसे जल रही, जैसे जले मशाल। धूल-धूल रस्ते हुए, सूखे-सूखे ताल। धरती ऐसे जल रही, जैसे जले मशाल। धूल-धूल रस्ते हुए, सूखे-सूखे ताल।