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Praveen Gola

Romance

4  

Praveen Gola

Romance

गर्मी

गर्मी

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कहाँ गई वो गर्मी अब ?

जो मिलती थी तेरे साथ से कभी,

जब तन से तन लिपट आपस में,

करते थे अधूरी बाते सभी।


मैं जाने लगती थी जब वापस,

तुम हाथ पकड़ बैठा लेते थे,

फिर चूम मेरे लब हौले से,

मचलता बदन सहला देते थे।


उस गर्मी की थी बात निराली,

जो बिन मौसम लाती खुशहाली,

खुद को रोकने की ज़िद में,

मैं हर बार पिघल जाती मतवाली।


पर हो ना सका अपना मिलन कभी,

वो गर्मी रह गई साँसों में यहीं,

अब जितनी बार ये साँसें भरती हैं,

तेरी गर्मी का सजदा करती हैं।


आज भी जब बिन मौसम कभी,

मेरे अक्स से पसीना बहता है,

मुझे दूर कहीं तेरे होने का,

फक्र इस दिल में रहता है।


तेरी गर्मी मैं कभी भुला ना पाऊँगी,

मूँद पलक उसपर वारी जाऊँगी,

गर फिर दुबारा मिलें हम कहीं दोनों,

तो उस गर्मी का एहसास ज़रूर चाहूँगी।।


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