गर्दिशो में
गर्दिशो में
गर्दीशों के शहर में ,
मैं घूम रहा हूं सहर में ,
ना जाने कब किस्मत,साथ देगी ,
इस जद्दोजहद की गदर में।
जिंदगी से अनजान सा हूं ,
अपनो में बेजान सा हूं,
रिश्तों की कब्र पर बैठा ,
एक मजबूर सा इंसान हूं,।
हर वक्त छीना गया मुझसे,
मेरे ही हक के निवाले,
ना जाने किस खुदा ने लिखी है ,
मेरे मनुहुसियत के तराने।
