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Dinesh Dubey

Tragedy

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Dinesh Dubey

Tragedy

गर्दिशो में

गर्दिशो में

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गर्दीशों के शहर में ,

मैं घूम रहा हूं सहर में ,

ना जाने कब किस्मत,साथ देगी ,

इस जद्दोजहद की गदर में।

जिंदगी से अनजान सा हूं ,

अपनो में बेजान सा हूं,

रिश्तों की कब्र पर बैठा ,

एक मजबूर सा इंसान हूं,।

हर वक्त छीना गया मुझसे,

मेरे ही हक के निवाले,

ना जाने किस खुदा ने लिखी है ,

मेरे मनुहुसियत के तराने।



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