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Dimple Dadsena

Abstract


4.9  

Dimple Dadsena

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ग्राम्य-जीवन

ग्राम्य-जीवन

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सूर्योदय के लालिम्य की दिखती परछाई तालाब में

हुआ सवेरा और सारे पक्षी उड़ते हैं सैलाब में।


प्रातःकाल के बयार से, उठने लगती तालाब में तरंग

तरुएँ जिसमें झुक-झाँक, व्यक्त करते अपनी उमंग।


लगे हुए हैं विविध वृक्ष, इसी ग्राम-सरोवर के पास

मधुर-मधुर पवन के संग, लगता हो जैसे मधुमास।


इन्हीं वृक्षों के समीप बिलों में, होता सर्पों का बसेरा

ऊपर शाखाओं में घोंसले, जिनमें लगता पंछियों का डेरा।


अपने नन्हे नवजात पंछी को, माता जब उड़ना सिखलाती

नन्ही चिड़िया तब पंख फैलाये, उड़ने को अकुला जाती।


बरगद वृक्ष के पास देखा मैनें, प्यारी गिलहरी दाना तलाशती

खुशी से प्रफुल्लित दाना लेकर, नन्हे गिल्लू के मुँह में डालती।


माँ की ममता सचमुच कितनी, सभी जीवों में होती है

अपने बच्चों की रक्षा में, माता कष्ट कई ढोती है।


यही बरगद का वृक्ष, राहगीरों को देता है आराम

सारे थके हारे यहाँ पे, शान्ति से करते हैं विश्राम।


तालाब के समीप ही एक बस्ती,जहाँ निवास करते सभी जन

भाईचारा से मिलकर रहने का, ग्रामवासियों का होता है प्रण।


अगर कोई परेशानी आये तो पंच परमेश्वर सुलझाते

सलाह, मशवरा करके, समस्या को वहीं पर निपटाते।


कर्म को पूजा मानकर, करते लोग खेतों में काम

सोने की चिड़िया भारत, इसीलिये तो बना महान।


मिलकर सभी पर्व, त्यौहार, ग्रामवासी मनाते

ऐसे ही पूरी दुनिया को ये, एकता का पाठ पढ़ाते।


आज बढ़ रहा शहरीकरण, लोग जा रहे शहरों में

पर ग्राम्य-जीवन सी एकता कहाँ, बड़े-बड़े नगरों में।


असहाय सा भिखारी जो उसे बच्चा चोर समझते हैं

नक्सली के डर में लोग, एक-दूसरे से भी डरते हैं।


ग्राम्य-जीवन सा अपनापन, मिलता नहीं शहरों में

यह तो एक सुखद उपवन है, कलयुग के कहरों में।


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