ग़म
ग़म
ये ज़माना मुझको ज़ख्म देता रहता है
क़िस्मत भी हर बार मुझको आजमाता है
ग़म और विरह के बादल आंँसू बरसाते है
दुख भी अपना रूप बदल के अब आते है
अब तो हर ग़म जाना पहचाना है
ज़िन्दगी दर्द भरा इक फ़साना है
हर रिश्ता मतलबी सा लगता है
अपने ही परछाईं से अब डर लगता है
भीड़ में भी अब ख़ुद को तन्हा पाते है
हर लम्हा अतीत को याद कर तड़पते है
अरमानों को अपने ख़ुद दफनाती हूंँ
अपने होठों पर मुस्कान सजाती हूंँ।
