गजल(इतबार)
गजल(इतबार)
हम झूठे इरादों पर एतबार नहीं करते,
करते हैं इकरार मगर हदें पार नहीं करते।
पहरा फिर क्यों लगाते हैं वो मेरी हरकतों पर,
पूछे उन्हें कोई क्या हम उन्हें प्यार नहीं करते।
हमें अभी भी गुमान है अपने दोस्तों की शान शौकत पर,
रहते कहीं भी हों मगर मिलने से इंकार नहीं करते ।
भीग चुके हैं चाहे हम भी सर से पांव तक उनकी मुहब्बत में
यह बात अलग है की हम इजहार नहीं करते।
माना की मिलती नहीं तनिक भी फुर्सत उनको घर से सुदर्शन,
आजाद हम भी इतने नहीं की मिलने का इंतजार करते ।
कोशिश करते हैं हर पल उन्हें सजाने, संवारने की,
फिर भी उन्हें शिकायत है कि हम उन्हें याद नहीं करते ।
कई बार पढ़ चुके हैं हमारे पन्नों को वो रद्दी समझ कर
मगर अफसोस नहीं जताया की वो हमारा दीदार नहीं करते।
रखी है सोच साफ सुथरी सुदर्शन, चाहे करे शिकायतें कोई जितनी भी किसी की
हम बिन देखे सुने किसी पर विश्वास नहीं करते।

