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KARAN KOVIND

Tragedy

4  

KARAN KOVIND

Tragedy

घुल रहा गल रहा

घुल रहा गल रहा

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घुलने के बाद मै 

अब नहीं रहा इंसान 

घुला हुआ तरल

कुछ अमृत कुछ गरल

पिघलता हुआ झर रहा हूं

छलनी की छेदों से 

अब इंसान नहीं हूं तो केवल पिघला 

हुआ घुला हुआ तरल

मुझमे झरनों से तेज आंधियों कि तरह

बहुशंख बहाव है।


अब मैं बहने लगा नदी की तरह

मुझमें घुली है मेरे अस्तित्व की सारी कथाये

गल चुकी है जीवन की पीड़ाएं

सोखी जा चुकी स्तब्ध करूणाये

अब केवल हूं तो पिघला हुआ

मुझमें पिघली है मेरी तृषा वेदना

और अंतर्मन की संवेदना

अब नहीं ओढ़ सकता ऊन के कोट

अब नहीं पहन सकता सरकंडों के चश्मे

जूते अब बिना पालिश 

चिथल जायेंगे

घने बाल पिघल कर शंख बन जायेंगे

हड्डियों की बनाती जायेगी सीपी 

मोटी और कुछ थोथरे सिलिकांन

हाथ तापते हुते दस्ताने जला दिये जायेंगे

पर सबसे आश्चर्यजनक बात यह है की 

उनको हड्डियां आस्थियां और

गली घुनी शरीर कहां मिलेगी

वो मुझे ढूढते हुये पहुंच न जाये

उस टीन की ओले में जहां टप टप चू रहा हूं 

खपरौले गोदाम की सरीखी पर जहां छप छप 

गिर रहा हूं

झरने की झरझराट में नदी की तख्ती में पलटता उलटता 

सरकता बह रहा हूं ।


कविता की अक्षरों से श्रोता के 

ह्दय में घुलती हुती असंख्य सवेदनाओ में

कहां कहां ढूंढोगे 

नहीं हूं इंसान हूं तो केवल घुल चुका पिघल चुका तरल

कितनों कि रमो में मिलाया जायेगा सिल्लियों

से गिराया जायेगा घुल कर हाला कि मादकता मे

मुझे पहचाना नही जायेगा

बहुत से लोग पी रहे मेरी घुली गली शरीर

जिसमें अंगूर लता की मादक घुला रस 

समझते हैं।



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