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Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

"घनघोर बादल"

"घनघोर बादल"

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इस जीवन मे छाये हुए है,बहुत घनघोर बादल

दिख न रहा रस्ता,हर तरफ ही छाया तम छल

बह रही फ़िजा में आजकल बड़ी मतलबी पवन

बड़ा ही उद्विग्न,ओर बड़ा ही हो रहा,मन विकल


कैसे दिखे रस्ता,स्वार्थ में अंधी हुई,आंखे सकल

जहां मतलब हो,वहां बह जाती है,यह कलकल

आज बेचारे आंसू हुए है,मगरमच्छ सम नकल

पहचान करना कठिन हुआ,कौनसे आंसू असल


इस कदर छाया,अमावस का अंधेरा हृदयतल

रोशनी में दिख रही,आजकल अंधेरे की शक्ल

फंसा हुए है,जीवन बेचारा स्वार्थ के दलदल

कैसे खिलाऊं,अब निःस्वार्थ रिश्ते का कमल


मुरझाए हुए है,मुफलिसी में खिले हुए कमल

घनघोर बादलों ने छिपाया हुआ,सूर्य उदयाचल

पर तू न डर साखी,जीवन मे वही होता,सफल

जो पीता,जीवन समस्याओं का हंसकर गरल


घनघोर तम में उसे दिखती आशा किरण नवल

जो परिश्रम की बाती से जलाता दीपक नवल

परिस्थितियों की आग उसको बनाती है,कुंतल

जिसने ओरों से नही,खुद से मांगा मुश्किल हल


जो लड़ता किस्मत से वो भाग्य भी सकता,बदल

भाग्य भरोसे न रहे,कर्म करे,मिलेगा अवश्य फल

वही समस्याओं के पत्थरों को बनाता है,कोमल

जो बहाता निर्मल कर्म अविरल झरना,कलकल


जिसके दिल मे,कुछ करने का जुनूं रहे पल-पल

मंजिल खुद आती,एकदिन उसके घर पर चल

जीवन बाधाओं से न डर,बाधाएँ होगी विफल

तू बस अपना कर्म कर जैसे बहती नदी अविरल


अपना निश्चय तू बना दृढ़,जैसे हिमालय अटल

छोड़ भी दे,तू व्यर्थ की करना दुनियादारी नकल

अपनी करनी ही काम आयेगी,फिझुल न मचल

जिसने किया पुरुषार्थ,उसने बदली अपनी शक्ल


आईने करते,उसे सजदा जिसके भीतर आत्मबल

कितनी आये निराशा,तू निराशाओं का कर कत्ल

आसमां में छेद कर,फेंक पत्थर आशा का सबल

फिर देख अमावस में भी उगेगा,पूनम चांद असल।



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