ग़ज़ल
ग़ज़ल
अपना हो या गैर सबसे करके बेगाना मुझे,
सारी दुनिया का बना डाला है दीवाना मुझे।
मैं नशे में हूं मुझ में खुद नशा आया सिमट,
साकिया! कैसा पिलाया है यह पैमाना मुझे।
एक मस्ती है जो दिल में है तरंगित रात दिन,
गम भी लहरा कर पुकार उठता है मस्ताना मुझे।
डालकर साकी ने मेरे दिल पर एक नजरे -करम,
पल में एक समझा दिया सब राजे -मयखाना मुझे।
आ गया है इश्क की मंजिल में अब ऐसा मुकाम,
एक हकीकत- सा नजर आता है अफसाना मुझे।
कहते थे दीवाना जब करता था बातें अक्ल की,
अब वह कहता हूं तो सब कहते हैं फरजाना ज्ञानी मुझे।
जिक्र साकी की इनायत का मैं , नीरज, क्या करूं,
अदना(तुच्छ) मयकश( शराबी)
से बनाया पीरे -मयखाना(रसाध्यक्ष) मुझे।

