STORYMIRROR

Sk Shihab

Romance

3  

Sk Shihab

Romance

वक्त की बाते

वक्त की बाते

1 min
260

वक्त की है सारी बातें

इस दरिया को मुसलसल बह जाने दो


किसी रोज़ जो टाकरा जाये मेहबूब के आँखों से नज़र

तो उन आँखों को धीमे से पढ़ लेने दो

धड़कने बढ़ जाए तो क्या

बस वक्त को थम जाने दो

इश्क़ होता है तो क्या

मुक़म्मल कायम हो जाने दो

उस पल को खीचो सौ सदियो मै

हर ज़र्रे को महसूस कर जाने दो


कभी लागे के जहर सा है इश्क़

तो खामोशी से नसो में उतर जाने दो

बस वक्त की बाते है

और वक्त के इस दरिया मै कैद हुए हम

इस दरिया को मुसलसल बह जाने दो।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Romance