ग़ज़ल - साथ जो छूटा हमारा
ग़ज़ल - साथ जो छूटा हमारा
साथ जो छूटा हमारा है अखरता आज भी।
है जिगर में आग का शोला दहकता आज भी।
क्या हुआ जो ना हुआ दीदार मेरे यार का,
चाँद सा चेहरा वो बादल में उभरता आज भी।
ठीक तुम अपनी जगह हो और मैं अपनी जगह,
है मगर ये बात सच दिल तो कसकता आज भी।
वक़्त काफी हो गया पर चाहतें अब भी बचीं,
दिल हमारे प्यार का अंकुर पनपता आज भी।
दूरियाँ भी बढ़ गयी हैं फ़ोन तुम करते नहीं,
पर रखा है ख़त पुराना वो महकता आज भी।

