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Mayank Kumar

Tragedy

4  

Mayank Kumar

Tragedy

ग़रीब बालिका

ग़रीब बालिका

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मेरी आज सारी खुशियाँ ख़त्म हो गई

उस बालिका को देख सब कहीं लुट गई

हाय रे! मानवता तुझे तनिक शर्म न आई

तेरी कुल की बेटी भूखी, नंगी तुझे मर्म न आई

भोंकते हो ख़ूब नारी सशक्तिकरण-नारी सशक्तिकरण

इस गरीब बालिका को देख ये नारे स्मरण न आई

मेरी आज सारी खुशियां खत्म हो गई . .!


बालिका किसी बाबू साहब को उम्मीद से देख रही थी

उस रोज अपने लिए सुरक्षा संग भोजन मांग रही थी

वह कह रही थी साहब भूख लगी है, साहब भूख लगी है

ये जूठी आइसक्रीम ही दे दो साहब , इसे ही खा लूं

मिल बांट के अपने भाइयों संग पेट की आग बुझा लूं

साहब इसे जूठा नहीं मानूंगी प्रसाद समझूंगी

ईश्वर को नहीं देखा लेकिन,

आपको ही माई-बाप समझूंगी . .!


माई-बाप बचपन में ही गुजर गए साहब

आपलोगों के हवाले हमें छोड़ गए साहब

मैं तो काफी छोटी हूं लेकिन समय के थपेड़ों

को खूब, अरे खूब, साहब खूब समझी हूँ !

माई बाप भूख लगी है . .,

ये आइसक्रीम ही दे दो साहब !

अरे, साहब दे दो ना . .


ऐ साहब कितना क्रूर निकला

उसे तनिक भी लज्जा ना आई

उस बालिका में उसने अपनी बेटी को ना पाई

उसको देख कर बस वह हंस रहा था

चल हट . ., वह जालिम उसे कह रहा था

बालिका को फिर ये समाज ठग रहा था

एक गरीब का चीरहरण फिर कर रहा था !


वह बालिका तब भी गिड़गिड़ा रही थी

निरंतर एक उम्मीद को बांध रही थी

उसे ही भगवान समझ भोजन माँग रही थी

शायद, रोज एक भगवान ऐसे ही उसे रुलाता था

बहुत यातना संग कुछ भोजन उपलब्ध करता था !

एक शोषित बालिका का, शोषण कर निकल जाता था ! !


बहुत कशमकश के बाद उस साहब ने

जूठी आइसक्रीम की कटोरी उसे सौंपी

चल हट भीखमंगी बोल धिक्कार उसे दी

वह बोली साहब, तुमने मुझे भोजन दिया

कुत्तिया भी बोल दो आज मंजूर है क्योंकि,

पेट चांडाल को शांत तुमने ही थोड़ा, पर किया !


थोड़ी दूर से देख उसकी बातें सुनकर

अंदर ही अंदर मेरा कलेजा फट गया था !

मेरी आज सारी खुशियां खत्म हो गई थी !


वह जूठी आइसक्रीम भाई संग ऐसे खा रही थी

मानो सारी मॉल की खुशियां भाई संग बांट रही थी

भाई को बोली बउआ तुलोग चिंता न करना

कपड़ें भी इसबार तुम्हारी, मुझे जुगाड़ कर देना

भाई बोला दीदी हमें न ये कपड़े पहनना

तुम्हारी अपमान होते और हमें नहीं देखना

वह बोली बबुआ यह अपमान नहीं, सुनना !

हम गरीबों का ये ही अधिकार हैं, इसे समझना !


उसकी बातें सुनकर और न खुद को मैं रोक सका

मैं गया वहां शुभचिंतक बन सोचा मुझे अब कुछ करना,

मुझे देखते ही वैसे ही वह साहब- साहब करने लगी

पेट में लगी है आग, खाने को दे दो साहब कहने लगी !


मैं बोला चिंता मत कर मैं आज तुम्हारी आग बुझा दूंगा

कितना पैसे चाहिए तुम्हें आज बोल दिल खोल दूंगा

वह बोली साहब पैसे-वैसे किसे चाहिए

भोजन ही दे दो, बस इतना रहम हमें चाहिए

मैं बोला नहीं बालिका मैं पैसे खूब तुम्हें दूंगा

बुझा ले आग. . पेट की आज, खुश तुम्हें मैं कर दूंगा

वह बोली सच में साहब तुम खुश हमें कर सकते हो !


हम गरीबों कि दुखों को तुम हर सकते हो

इतना बोलते ही उसकी आंखें भर आई

मैं बोला मत रो बेटा, ये पांच सौ रुपये तुम रख लो

खूब मजे मारो, भाई संग अब थोड़ा हंस लो ।

वह बोली भोजन के लिए दे रहे हो तो रखती हूं

लेकिन मेरे जैसे और भी हैं उनके लिए कुछ कहती हूं,

मैं बोला बेहिचक बोलो, आज सब बात तुम्हारी मान लूंगा !


अरे, तुम हो चांद-सी गुड़िया तुम्हारी कोई भी हठ न टालूँगा

दुनियाभर की सारी खुशियां तुम्हें सौंप आज डालूँगा

तुम देखना आज तुम्हें मैं कितना खुशियां दे डालूंगा !

मेरे इतना बोलते ही उमंग से वह भर गईं

अपने सभी सखियों को मेरे पास बुलाई

बोली साहब, क्या करूं हमारी समाज की फितरत है।


भीख में मांगे प्रसाद को मिलजुल कर खाने की आदत है

यह पांच सौ रुपए थोड़ा कम है कुछ और पैसे दे दो

आज का भोजन हम सखियों को तुम मन भर करवा दो !

उन लोगों को देख मैं स्तंभ रह गया था

इतनी बड़ी संख्या देख सोच में पड़ गया था।


वह बोली क्या हुआ साहब तुम क्यों चुप हो

अभी तो बोले तुम हमारे ही शुभचिंतक हो

उसकी बातें सुनकर मैं चुपचाप बैठ गया था

उनकी संख्या देख फूट-फूट कर रो पड़ा था

मुझे रोता देख वह बालिका मेरे पास आई

आंसू पोछ मेरे पैसे मुझे थमाई

और बोली साहब, अगर सच में,

तुम कुछ कर सकते हो तो इतना करना,


रोज रात तारों की झुंड में कुछ तारों को शांत कर देना

जो भूखे पेट मरे हैं, फ़िर भी अपनों के लिए चमक रहे हैं

थोड़ा उन्हें ढांढस देना !

और हां साहब उस चांद को भी खूब देखना

हमारी दुखों को देख जो थोड़ा वह मैला पड़ा

थोड़ा उसे भी ढाढ़स देना !


अरे, साहब हमारी दुखों से आसमां भी रोज रोता है

तुम लोग जैसे शहजादे हमें जब भिखारी कहता है

यह नेता, बाबा सब तुम्हारे रक्षक है साहब ,

हम जैसों का तो ए आसमां ही संरक्षक हैं साहब

और ए जमीं बिस्तर है साहब, यही जीते मरते हम साहब !

अब जाओ साहब यहां तुम्हारा अपना कोई समाज नहीं

खूब खेलों, नाचों, गाओं अपने उस समाज में तुम कहीं !


और सुनो साहब तब भी गर हमारी याद तुम्हें आए

तब उन रईसों को मत भेजना जो हमारी मजाक उड़ाए

वो रईस विदेशी हमारे पास साल में एक बार आते हैं

कुछ हो ना हो, हमारे लिए साहब !

पर फ़ोटो खिंच ले जाते हैं

विश्व बैंक इंडेक्स के चित्रों में,

हमें हीरो- हीरोइन बना खुश हो जाते हैं !


बस हमें तुम हीरो-हीरोइन बनने से बचा लेना,

बहुत बेशर्म इंडस्ट्री है, इससे हमें बचा लेना !

अगर इतना कर दिए तो मानूंगी,

तुम ही हो हमारे माई- बाप

गर सब जैसे बस सुनकर,


कुछ आंसू बहा कर निकल गए

तो फिर हमेशा हमें यही पाना

साहब-साहब करते-करते,

नजर हमें यहीं आना !

और यहीं बोलूंगी फिर,

साहब पेट में आग लगी है;

कुछ खाने को तो दे दो तुम।


तुमको ही माय-बाप समझूंगी,

इतना तो कर दो तुम . .!

ये आइसक्रीम ही दे दो साहब !

अरे, साहब दे दो ना

उसकी बातें सुनकर मैं बस

टकाटक उसे देखता रहा गया था

और उसी क्षण मेरी सारी खुशियां

मानो खत्म हो गयी थी।


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