Ghazal No. 20
Ghazal No. 20
दर-पेश-ए-आईना अब आता कौन है
अपने ज़मीर से अब नज़रें मिलाता कौन है
बे-लौस निस्बतें यहाँ बनाता कौन है
ये हुनर ज़माने में आज़माता कौन है
जिसे भी किया तूने अपनी बज़्म से रुसवा
उसे फिर ज़माने में अपनाता कौन है
दूसरों का ग़ुरूर तोड़ के बहुत इतराते हैं लोग
अपनी अना से यहॉं पार पाता कौन है
जी रहे हैं ज़िंदगी सभी एक अज़ली ख़्वाब समझ
मौत का मंज़र अपनी आँखों में बसाता कौन है
तेरे दम से ही तो है दिल में रौनक
और इसमें महफ़िल-ए-ग़म सजाता कौन है
बड़ी शिद्दत से लोग निभाते हैं दुश्मनी मज़लूमों से
रसूखदारों को यहाँ दुश्मन बनाता कौन है
दौलत-ओ-शोहरत के तो हैं कई अहबाब यहाँ
मुफ़लिस-ओ-ग़ुमनाम से दोस्ती निभाता कौन है
बच्चे की एक तकलीफ़ पे आ जाता कलेजा मुँह को
बूढ़े माँ- बाप के दर्द पे आँसू बहाता कौन है
साहिल पे खड़े होकर ही देते हैं लोग मशवरे
उसमें उतरकर दरिया पार कराता कौन है
गए वो दिन अब ग़म-ए-हिज़्र के
जुदाई का मातम अब मनाता कौन है
तमाम शहर बना बैठा है रकीब हमारा
यहाँ तेरा पता हमें बताता कौन है
ये मय-कदा नहीं दुनिया है वाइज़
यहां अपना जाम दूसरों को पिलाता कौन है
फ़िदा हैं सब यहाँ सूरत की चमक पर
सीरत पर यहॉं जान लुटाता कौन है
मैं अपना दिल तेरे दिल से मिलाता कैसे
दानिस्ता शीशे को पत्थर से टकराता कौन है
खुद को ही जलाना पड़ता है घर में रौशनी के लिए
औरों की दहलीज़ पर यहाँ चराग़ जलाता कौन है
ज़िन्दगी से तो हर एक को हैं बेशुमार शिक़वे
मौत से यहाँ जुबां लड़ाता कौन है
माँग भर अपने लहू से महबूब-ए-ग़म की
यूँ उम्र भर वफ़ा निभाता कौन है
अमीर के बच्चे की एक मुस्कान पर फ़िदा है सारा जहाँ
रोते हुए गरीब के बच्चे को मनाता कौन है
बैठते थे थक के सब उसी के साये में मगर
सूखने पर उस शज़र को कटने से बचाता कौन है
रखता हूँ नक़ीदा को अपने मद्दाह-ओ-अहबाब से ज़्यादा करीब
आईना-ए-हकीकत और मुझको दिखाता कौन है
करते हैं सब चढ़ते हुए सूरज की परस्तिश
ढलते हुए सूरज को जल चढ़ाता कौन है
निकाल दो किताबों से सदाकत-ओ-ईमान-ओ-वफ़ा के किस्से
अब ये सबक अपने बच्चों को सिखाता कौन है
लेते हैं लोग अहल-ए-आसमां का नाम सुबह-ओ-शाम
आसमां से ज़मीं वालों को आवाज़ लगाता कौन है।
