घाटे का सौदा...
घाटे का सौदा...
जब तक तथाकथित बड़े ओहदेवाले
असल मुद्दों पर कब्र की मिट्टी डालकर
बस समाजोद्धार का वही घिसापिटा बेसुरा राग अलापने की
भद्दे नाटकों से तौबा नहीं करेंगे...
जब तक वो बेरहम नुमाइंदे
किसी मजबूर ईमानदार इंसान का
हक़ मारने से बाज़ नहीं आएंगे,
तब तक कोई संगठित कार्य प्रणाली
सही मायनों में सफल नहीं हो पाएगी...!
क्योंकि जब तक एक भी लायक इंसान
दुसरों की बनाई हुई मजबूरियों के चक्रव्यूह में फंसकर
यूँ दर-ब-दर बेमतलब
ठोकरें खाते फिरेगा,
तब तक इन रंग-ए- महफिलों में
आयाराम-गयाराम के नमूने
पेश किए जाएंगे
और उन आरामदायक कुर्सियों पर बैठकर
दुसरों का नसीब लिखनेवाले
खुद भी एक दिन अपना तख्त-ओ-ताज़
डगमगाते हुए पाऐंगे...
तब क्या हश्र होगा उन खोखले ख्वाबों का,
जो वो सपनों के बेईमान सौदागर
मजबूर-लाचार-ईमानदार लोगों को दिखाते फिरते हैं...???
