STORYMIRROR

V. Aaradhyaa

Tragedy

4  

V. Aaradhyaa

Tragedy

मेरे जख्मों की तुरपाई ना हुई

मेरे जख्मों की तुरपाई ना हुई

1 min
360

बारहा देखा है कि सूरज के छिपते ही,

गायब हो जाती खुद की जाती परछाई है !


लेकिन भरी दुपहरी ही यह तितली ,

क्यूं छुपकर गुल से मिलने चली आई है !


सबके अपने अपने दर्द अलग हैं ,

और अपने अपने अलग अलग किस्से हैं !


भला ऊपर से देखकर कौन बताए कि ,

दर्द का हुआ बंटवारा कितने इसके हिस्से हैं!


किसकी आँखों में अब उभर आए आँसू ,

उल्फत में कितनों ने चोट जिगर में खाई है।


सच तो यह है कि जो जितना‌ मुस्काता है,

बस समझो उसने उतनी गहरी चोट खाई है !


जो कहा करते थे कि रह लेंगे तेरे बिन,

आज मेरे बगैर कैसे उनकी जां निकल आई है!


ज़ब भी आदतन मेरी नज़र मिली उनसे ,

तब तब उन्होंने इठलाकार ली अंगड़ाई है!


हम तो बस अपनों से ही बचकर रहते हैं ,

कई दफा हमने उनसे चोट बड़ी गहरी खाई है!


यूँ तो अक्सर भर आती हैं हमारी आँखें ,

अपने गहरे जख्मों की हँसकर की तुरपाई है!


हमने जब कभी खुद को तन्हा है पाया,

अपने साये संग रहकर दूर हुई तन्हाई है!



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy