STORYMIRROR

Kavita Sharrma

Tragedy

3  

Kavita Sharrma

Tragedy

गांव/शहर

गांव/शहर

1 min
190

हरे भरे वृक्षों से भरा 

गांव हुआ करता था

पक्षियों के कलरव से

चहका कभी करता था

आते जाते राहों पर

आवाजें खनका करती थीं

पानी भरने नदी किनारे

भीड़ रहा करती थी

सब दरवाजे घरों के

सदा खुले रहते थे

सबके स्वागत के लिए

घर में भरपूर व्यंजन रहते थे

धीरे धीरे गांव की जगह

ली है जब से शहरों ने

जंगल कटते जा रहे हैं

ले ली जगह अब

कंक्रीट के जंगलों ने

दिन रात की भागदौड़ में

आदमी खुद को भूल रहा है

झूठी शान -दिखावे की

जिंदगी मानो जी रहा

पैसा है भरपूर फिर भी

खुशी है बिल्कुल गायब

गांव में ही था असली जीवन

शहरों में केवल है दिखावे का जीवन



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy