एक थी लड़की नकचढ़ी
एक थी लड़की नकचढ़ी
एक थी लड़की नकचढ़ी
बातें करती बड़ी बड़ी
गुस्सा हरदम नाक पर रहता
हँसती जैसे फूलों की लड़ी।
चूहे से डर जाती वो
फिर भी शूरमा कहलाती वो
सब पे रौब जमाती वो
आर्डर देती खड़ी-खड़ी।
एक थी लड़की नकचढ़ी
किताब ना उसके हाथ से हटती
राम जाने क्या क्या पढ़ती
आती जब परीक्षा की घड़ी
कर देती मेरी भी खटिया खड़ी।
बातें करती बड़ी बड़ी
एक थी लड़की नकचढ़ी
बातों की चाट बनाती
खूब हींग-मिर्च उसमें लगाती
बड़ा प्यारा सा मुँह बनाती।
मीठी-मीठी डाँट लगाती वो
अपनी बात पे रहती अड़ी-अड़ी
एक थी लड़की नकचढ़ी
बातें करती बड़ी बड़ी।।
