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Archana Verma

Romance

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Archana Verma

Romance

एक शाम के इंतज़ार में

एक शाम के इंतज़ार में

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कोई शाम ऐसी भी तो हो

जब तुम लौट आओ घर को

और कोई बहाना बाकी न हो।


मुदत्तों भागते रहे खुद से

जो चाहा तुमने न कहा खुद से

तुम्हारी हर फरमाइश पूरी कर लेने को

कोई शाम ऐसी भी तो हो

जब तुम लौट आओ घर को

और कोई बहाना बाकी न हो।


मैं हर किवाड़ बंद कर लूँ

के कोई दरमियाँ आ न सके

बस ढलते सूरज की रौशनी में हम दोनों

कोई शाम ऐसी भी तो हो

जब तुम लौट आओ घर को

और कोई बहाना बाकी न हो।


ढेरों शिकायतें शिकवे गिले

जो अब तक दिल में हैं दबे पड़े

उन्हें तुम्हारे सीने में छूप के  कह लेने को

कोई शाम ऐसी भी तो हो

जब तुम लौट आओ घर को

और कोई बहाना बाकी न हो।


हो हर सुबह शुरू तुमसे

और रात आँखों में कटे

जैसे लम्बे इंतज़ार की थकान बाकी न हो

कोई शाम ऐसी भी तो हो

जब तुम लौट आओ घर को

और कोई बहाना बाकी न हो।


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