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Mamta Singh Devaa

Tragedy


3  

Mamta Singh Devaa

Tragedy


' एक सच ये भी है '

' एक सच ये भी है '

1 min 199 1 min 199

ये सुबह बहुत डराती है

मगर ये काली अंधेरी रात दिल को भाती है,

बस ये रात ठहर जाये कैसे भी करके

ये सूरज को निगल जाये,

नहीं तो अगली सुबह वो फिर से आयेगा

और बेहद थका जायेगा,

थकते थकते ज्यादा ही थक गई हूँ

इस थकान से पक गई हूँ,

मन से काम करो तो एक उत्साह रहता है

नहीं तो उत्साह ख़ाक रहता है,

कोई नहीं समझता किसी के मन के दर्द को

अब कहाँ ढूंढ़ूँ अपने हमदर्द को,

सारा खेल मन का ही तो है शरीर का थका तो चल जाता है

मन का थका तो मर जाता है।



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