STORYMIRROR

कवि काव्यांश " यथार्थ "

Tragedy Inspirational

4  

कवि काव्यांश " यथार्थ "

Tragedy Inspirational

एक नया सृजन।

एक नया सृजन।

1 min
246

एक नया सृजन


सोच की दुनिया निराली होती,

जहां तक चाहो, वहां तक जाती।

आसमान से ऊँचा इसका डेरा,

समुद्र से गहरा मन का सवेरा।

कभी यह बादल बनकर उड़ती,

कभी नदी संग बहकर मुड़ती।

कभी सितारों से बातें करती,

कभी धूप-छाँव में रंग भरती।

सोचा तो सपनों की डोरी बंधी,

बिन पंखों के उड़ान हैं सजी।

पर जब ये लौटे पलटकर वापस,

मन को लगे कुछ थका-थका सा बस।

पर सोच की राहें थमती नहीं,

जहां चाहो, वहां झुकती नहीं।

नए विचारों की लौ जलाकर,

हर सीमा को ये लांघ भी जाती।

तो चलो, सोचें अनंत दिशाओं में,

भरें नई उड़ान इन मस्त हवाओं में।

भावों के रंग से रंग लो जीवन,

हर सोच को बना लो एक नया सृजन! ।।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy