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V. Aaradhyaa

Tragedy

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V. Aaradhyaa

Tragedy

एक नीरव सन्नाटा है

एक नीरव सन्नाटा है

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आज चारों ओर एक नीरवता है 

फिर भी चीखता सन्नाटा है।

हर चेहरे के पीछे गहरा- दर्द है 

पर, दर्द किसने किसका बाँटा है।

धीरे-धीरे दम तोड़ती साँसें हैं 

बंद कमरों में कंकाल बनती लाशें हैं।

ज़िंदगी कहाँ आसान है...?.

 

मन- मस्तिष्क में द्वंद घमासान है।

तप्ती हवाओं के थपेड़े हैं 

मँझधार ही मँझधार है 

दूर तक न बेड़े हैं।

चेहरों पर मुस्कान1 है 

फिर भी हर शख़्स परेशान है.


अँधकार गहरा है 

ज़िंदगियों पर समय का पहरा है।

कोरे दिखावों का ज़माना है 

इंसान ने स्वयं को ही कहाँ पहचाना है?

धरा का अंतस चीरा है 

पर, किसने सुनी उसकी पीड़ा है। 

हर जगह भीड़-भाड़ है 

प्रकृति से बेहिसाब छेड़-छाड़ है।

प्रकृति दंश झेल रही है 

और मानवता खेल, खेल रही है। 

नारी पर अत्याचार है.

 

चारों ओर व्यभिचार ही व्यभिचार है।

कहने भर को उन्नत हैं

अब धरा पर कहाँ जन्नत है?

समझ में कुछ नहीं आता-

यह कैसी आज़ादी है?

आज़ादी में ही बेपरवाह सी बर्बादी है।

बुज़ुर्ग वृद्धाश्रमों में रहने को मजबूर हैं 

संतति अपनी ही ज़िंदगी में मशरूफ़ है।

कैसा यह झमेला है? 

कैसा यह ज़िंदगी का मेला है?

कोई मौज- मस्ती में डूबा है 

किसी ने ज़िंदगी को जबरन धकेला है। ।


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