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Vivek Mishra

Classics Inspirational

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Vivek Mishra

Classics Inspirational

एक दीया था

एक दीया था

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एक दीया था

एक दीया था...

न जाने किस ज़िद में
आख़िरी साँस तक जलता रहा।

आँधियाँ आती रहीं,
धुआँ उसकी आँखों में भरता रहा,
मगर उसने
अपनी लौ का हाथ
कभी नहीं छोड़ा।

उसके बुझने के बाद
बहुत लोग आए।

किसी ने कहा—
"रोशनी कितनी ख़ूबसूरत थी..."

किसी ने कहा—
"उस जैसा कोई नहीं होगा..."

मैं सोचता रहा...

जब वह जल रहा था,
तब किसी ने
अपनी हथेलियों की ओट देकर
उसे बचाया क्यों नहीं?

अजीब अधूरापन है
हमारे विचारों में।

हर किसी को
आँधियों से लड़ता हुआ
एक दीया चाहिए,

मगर...

कोई दीया बनना नहीं चाहता।

कोई अपनी लौ से
थोड़ा-सा उजाला बाँटना नहीं चाहता।

कोई एक पल के लिए भी
आँधियों के सामने
दीवार बनकर खड़ा नहीं होता।

काश...

किसी ने
उन आँधियों का रास्ता
ज़रा-सा रोक लिया होता।

तो कितने ही दीये
एक साथ जल उठते।

हर आँगन में
रोशनी उतर आती।

उजाला
किसी एक का नहीं,
सबका होता।

फिर किसी एक दीये को
अमर होने के लिए
अकेले मरना न पड़ता।

क्योंकि...

उजाला कभी
एक दीये से नहीं बनता,

उजाला तब जन्म लेता है
जब कई लौएँ
एक-दूसरे को
बुझने नहीं देतीं।


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