वो चला गया
वो चला गया
बस वो यूँ ही छोड़ कर चला गया,
एक बार भी पलट कर नहीं देखा।
ऐसा लगा जैसे कोई रिश्ता कभी था ही नहीं,
कोई एहसास, कोई राब्ता, कोई तअल्लुक था ही नहीं।
जिसे हम उम्र भर अपनी कहानी समझते रहे,
वो शायद एक गुज़रता हुआ किस्सा था।
हम उसकी यादों को घर बनाते रहे,
और उसके लिए ये घर कभी अपना था ही नहीं।
बस निहारते रहते हैं तस्वीरों में
सब पुरानी यादों को,
जैसे उनमें कहीं कोई जवाब छुपा हो,
या कोई अधूरी बात अब भी ठहरी हो।
कभी किसी मुस्कुराहट पर ठहर जाती है नज़र,
कभी किसी लम्हे पर दिल भर आता है,
वो सब कुछ जो गुज़र गया कब का,
न जाने क्यों आज भी लौट-लौट कर आता है।
मगर तस्वीरों के लोग कहाँ लौटते हैं,
वो तो बस यादों की दीवारों पर टंगे रहते हैं,
बदलता रहता है वक़्त, बदलते रहते हैं हम,
और कुछ चेहरे वहीं के वहीं ठहरे रहते हैं।
न जाने किसकी याद आती है,
न जाने कौन याद करता है,
कभी यूँ ही किसी ख़ामोश शाम में
दिल किसी अनदेखे दर पर दस्तक देता है।
इस उम्र में अब किसी और का होना भी क्या होगा,
रूह पर लिखे नाम कहाँ आसानी से मिटते हैं,
जो किस्से अधूरे रह गए वक़्त की किताब में,
वो उम्र भर हाशियों में ही रहते हैं
इस उम्र के बाद अब कोई नया किस्सा क्या बन पाएगा,
दिल तो बन जाएगा शायद, मगर वैसा क्या बन पाएगा,
अब मोहब्बत से ज़्यादा आदतें साथ रहती हैं,
और आदतों के शहर में कोई कहाँ बदल पाता हैं।
फिर भी कभी-कभी सोचता हूँ,
कि ज़िंदगी ने अगर कोई नया मोड़ लिख रखा हो,
तो शायद किसी अजनबी की मुस्कान में
एक अधूरा सफ़र फिर से शुरू हो जाए।
एक सच मगर ये भी है कि
जिनके लिए हम कभी पूरी दुनिया थे,
अब उनकी दुनिया में हम कोई भी नहीं
उन्हें याद आएँ या न आएँ,
हम उन्हें याद कर लेते हैं।
