एक और कविता
एक और कविता
एक और कविता
एक और कविता
लिखनी पडेगी पतझड़ पर
सूखे हुए पत्तों में छुपी हुई दास्तान पर
ये सूखे हुए पत्ते जो छूट चुके दरख्तों से
इनमें कई लफ्ज़ गुम हो गये हैं चुपके से
इन लफ्जों की गुनगुनाहट सुनाई देती है ज़रा ज़रा
इश्क की आह
मोहब्बत का रंज
प्यार की कशिश
या कुछ और भी हैं
इसके सरसराहट में एक बार फिर से
एक आवाज़ एक कहानी होगी
लेकिन अब तक ये रहस्य ही रहेगी
एक और कविता
लिखनी पड़ेगी गुलमोहर पर
वो जो महक तो जाता है हर बार
पर याद किसी की दे जाता है बार बार
यादों की महक में लिपटा ये गुलमोहर
किसी के लिखे खत में अश्कों का होगा गुलमोहर
एक और कविता
लिखना पड़ेगी इंतजार में रही चांदनी पर
ये चांदनी जो जुगनू को चमकाती है
अपनी लिखी कविता से
वहीं चांदनी फिर से बिखरे पल को समेटे रहती हैं
अल्फाजों के घने अंबर में
एक और कविता
लिखने पड़ेगी उस शख्स पर जो हमेशा ही पहचान बन कर रह जाता है अल्फाजों की सादगी पर
