STORYMIRROR

Raj sharma

Abstract

3  

Raj sharma

Abstract

सम्भल रे मनवा

सम्भल रे मनवा

1 min
198

पल-पल जोड़े गुच्छियां, मन में पाले जनजाल

नित नवीन रंजीशे लिए, फिर भी बने सज्जन


षड्यंत्र मन में भरा रहे, फिर भी शुद्धता का ढोंग

अपने को सच्चा माने, है सब दिखावे की चलन


सामने शुभचिंतक बने, पाछे बुने खोट पे खोट

ऐसे जनों से सावधान, दे अपनों को गहरी चोट


हर घड़ी स्वांग रच गए, मूढ़ दूजे को समझते ये

सतर्क रहें ऐसे दुष्टों से, न मिले कभी स्वप्न में भी।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract