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Satyendra Gupta

Abstract

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Satyendra Gupta

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एक अनाथ बच्चे का दर्द

एक अनाथ बच्चे का दर्द

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कोई नहीं सुनता कोई नहीं सुनता

कोई नहीं सुनता

मेरी दुखों की बातें

मेरी दुखों की रातें

कोई नहीं सुनता, कोई नहीं सुनता


क्यू चले गए पापा , क्यू चली गई मां

अपने लाडले को छोड़कर

क्यू चली गई मां

तेरे लाडले को अब कोई प्यार नहीं करता

खाने को तो अब कोई नहीं है कहता

बस रोता रहता हूँ, तुझ सा कोई नहीं समझता

क्यू चले गए पापा, क्यू चली गई मां

कोई नहीं सुनता, कोई नहीं सुनता

कोई नहीं सुनता


मेरे सपनों में आना, प्यार मुझे करना

आप लोगों से मुझे जुदा नहीं रहना

जुदा नहीं रहना , जुदा नहीं रहना

तेरे लाडले को अब कोई पढ़ने को नहीं कहता

चाचा की दुकानों में अब काम है करता

तेरा लाडले को दुनियादारी आ गई

इस छोटी सी उम्र में समझदारी आ गई

लेकिन दुख का ये पहाड़ , नहीं है घटता

कोई नहीं सुनता , कोई नहीं सुनता

कोई नहीं सुनता।

जब लाडला तेरा था रूठ सा जाता

तू मुझको मनाती थी

अब कोई नहीं मनाता

कोई नहीं सुनता , कोई नहीं सुनता 

कोई नहीं सुनता।


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