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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy

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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy

दो पल की है जिंदगानी

दो पल की है जिंदगानी

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हुश्न से झिलमिल चेहरा तेरा,

शबाब से भीगे होठो पे सेहरा मेरा।


न कर चर्चा किसी से मेरी मोह्वत का,

खून से लात पथ है आशियाना मेरा।


जवाबों के साये में लिपटी है अर्थी मेरी,

जरा सब्र से कहना किस्सा मेरी मोह्वत का।


टूटी हुई सांसों से बिखरी हुई जिंदगानी है,

भीगी हुई पलकों में सिसकती हुई जवानी है।


समझे न कोई ये फरेव ए-अश्रुधारा मेरी,

बीती हुई कहानी में लिपटी हुई जवानी है।


कैसे बताऊ दर्द अपना तुझे,

वेघर वे सहारा हूँ मैं,


कैसे सुनाऊ हाल-ए -दर्द तुझे,

वे सब्र किनारा हूँ मैं,


दो पल की है जिंदगानी,

एक पल का सहारा हूँ मैं।


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