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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy

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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy

दिल में जो गम है वो बहुत मगर..

दिल में जो गम है वो बहुत मगर..

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तुम्हारे गिले शिकवे भी पसंद मुझे,

मारो पीटो प्यार में जान देना पसंद मुझे,

लेकिन इस तरह छोड़ कर न मारो मुझे,

कसम है जान तुम्हें खंजर से मारो मुझे।


तू दिल में बसी होती तो मैं भुला देता,

तुझे सांसों में बसाया हमने

काश यह सब झूठ होता,

दिल में जो गम है वो बहुत मगर सांसें कम हैं,

काश तेरे जैसा गर्म सांसों से

भरा दिल मेरे पास भी होता।।


प्यार में दिल से रुलाने वाले,

कभी जिंदगी में खुश नहीं रह पाते हैं,

हालात पर छोड़ कर जाने वाले,

वहीं छोड़ देते लोग जहां ले जाते हैं।


अब यूं ही नहीं जीना है मुझे,

अब उम्र भर खुश रहना होगा,

हर हाल में अपनों के लिये मुझे,

तेरे गम से मुझे निकलना होगा।


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