दिल चाहता है
दिल चाहता है
दिल चाहता है
दिल चाहता है,फिर वही छोटी-सी गुड़िया बन जाऊँ,
फिर वही नन्हीं तितली बन जाऊँ।
माँ की गोद में रखकर सर, फिर सुन्दर से स्वप्न सज़ाऊँ।
पापा से फिर लाड़ कराऊँ, भाइयों की नटखट बहन कहाऊँ,
बहनों की सौम्यता के आगे, फिर चंचल सी नज़र घुमाऊँ।
दिल चाहता है...... फिर से मैं छोटी हो जाऊँ।
फिर पंख खोल नभ में घूम आऊँ, फिर निश्चिंत स्वर में गाऊँ।
ज़िम्मेदारियों का पिटारा छोड़, फिर खुद से ही जुड़ जाऊँ।
बचपन के वो खेल पुराने,
भूतों की कहानियाँ, नित नए फ़साने,
फिर से उनमें लौट जाऊँ, फिर से मैं छोटी हो जाऊँ।
वो निश्चिंत नींद, वो निश्चल खेल,
वो स्कूल की छुट्टियाँ, वो त्योहारों पर मेल,
ना कोई AC, ना inverter, न TV, न फोन की फ़िक्र।
वो बत्ती का गुल हो जाना,खेलने का एक नया बहाना,
वो बड़ों की सीख, वो सबका मिलकर काम कराना।
ना कोई नौकर,फिर भी खुश होकर हाथ बंँटाना।
दिल चाहता है..... उस बेफिक्री में फ़िर खो जाऊँ,
फ़िर एक बार 'हेमू' बन जाऊँ।
