STORYMIRROR

Hemlata Hemlata

Abstract

4  

Hemlata Hemlata

Abstract

नारी

नारी

1 min
1

 हाँ मैं नारी हूँ, मैं नारी हूँ ,पर बेचारी नहीं.
घर की रौनक सारी हूँ , जिम्मेदारी से हारी नहीं।
कमज़ोर न मुझको तुम समझना,
चट्‌टानों से भी टकरा जाऊँगी।
 कुचलने की कोशिश जो तुम करोगे,
 काँटे बन छलनी कर जाऊँगी।
 सोचोगे जो मुझे अकेला ,
 नौ रूपों में प्रकट हो जाऊंगी।
कभी तन्हा जो जानोगे,
महफिल बन मुस्काऊंगी ।
करना चाहोगे जो मुझे कैद ,
पंख फैला उड़ जाऊँगी।
 जितना मुझको बांधोगे,
 उतने बंधन तोड़ दिखलाऊंगी।
जितना नीचे गिराओगे,
 उतनी ऊपर उठ जाऊँगी ।
जो चाहोगे धूल में मिलाना,
 परचम बन लहराऊँगी ।
हिरनी जो मुझको मानोगे,
शेरनी बन वार कर जाऊंगी।
 टुकड़ों में जो मुझको बाँटोगे,
 किरणों सी बिखर चमक दिखाऊँगी।
बदनाम जो करना चाहोगे,
 नाम उतना कर जाऊँगी ।
शब्दों को जो मेरे रोकोगे ,
कलम बन सब सब लिख जाऊंगी
सम्मान जो तुम करोगे मेरा
खुशी-खुशी झुक जाऊंगी, माथे का तिलक बनाऊँगी ,
हाँ मैं नारी हूँ विघ्नों रसे कभी हारी नहीं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract