धरती की पुकार
धरती की पुकार
धरती की है करुण पुकार।
कृष्ण करो फिर से उद्धार।
नोच लिये मेरे सब आभूषण।
करे मलिन तन मेरा प्रदूषण।
नहीं सुरक्षित पर्वत दुर्गम।
भवन बनाये भारी भरकम।
ताप मेरा नित बढ़ता जाता।
सागर स्तर उठता आता।
रिक्त हो चला वन का कोष।
तुम्हीं कहो क्या मेरा दोष।
दूषित कर दी नदियाँ सारी।
बहुत हो गया अब मैं हारी।
हुयी विषैली अब ये वायु।
प्रतिदिन घटती मेरी आयु।
पशु-पक्षियों पर दया न आती।
लुप्त होती जा रहीं प्रजाति।
प्लास्टिक हर तरफ फैली है।
अब तो गंगा तक भी मैली है।
नहीं नियंत्रित मानव उपभोग।
बड़ा भयंकर लोभ का रोग।
सब देश मिलकर करते शोषण।
फिर एक दूसरे पर दोषारोपण।
त्राहि माम प्रभु त्राहि माम।
जय श्री कृष्णा जय श्री राम।
