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Bhavna Thaker

Tragedy

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Bhavna Thaker

Tragedy

धृणा है मुझे

धृणा है मुझे

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धृणा है मुझे मौजूदा सदी में पेश हो रहे मेरे वजूद के अफ़सानों से,

दिलचस्प सी कोई गाथा लिखने जा रही हूँ।

 

कब तक इंतज़ार करूँ मेरे प्रति समाज के सुलझे विचारों का,

प्रतिक्षा में छुपी आशाओं के पन्नें खोल रही हूँ।

 

अनर्थ, अत्याचार, आडंबर मेरी त्वचा से लिपटे जला रहे है,

सदियों से पसीजते विमर्श को धो रही हूँ।


स्त्रियों की ज़ुबाँ हूँ, आज़ादी का अनुराग उत्पन्न करते

अल्फ़ाज़ों को मुखर कर रही हूँ।


तीर सी चुभे मेरे बोल की नोंक तो मलाल मत करना,

दिए हुए ज़ख़्म सूद समेत लौटा रही हूँ। 


तितली थी इत-उत उड़ने की आदी,

गाय में परिवर्तित करते खूँटे से बाँध दी गई,

अब जश्न का आगाज़ कर रही हूँ 


उखाड़ फैंका है गले को भिंचता गलामा हल्का महसूस हो रहा है,

आसमान अपने हिस्से का तलाश रही हूँ।

 

थक चुका तलहटी पर रेंगते अस्तित्व मेरा उड़ान दे जो

हौसलों को ऐसी परवाज़ ढूँढ रही हूँ।


चल रही थी जो एडिटिंग ख़त्म हो चली, अब कोई भ्रम मत पालना,

योजनाओं का हकीकत की धरा पर अमल कर रही हूँ। 


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