STORYMIRROR

Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

4  

Vijay Kumar parashar "साखी"

Tragedy

धोखा हुआ मेरे साथ

धोखा हुआ मेरे साथ

1 min
273

हर वक्त यहां पे बड़ा धोखा हुआ मेरे साथ है

ज़ख़्मों पे नमक लगाया लोगों ने बिना बात है

जिस पे जितना ज्यादा भरोसा किया था मैंने,

उसी ने पीछे से लहूं बहाया मेरे जाने के बाद है


पत्थरों को आया रोना सुनकर मेरे जज़्बात है

हर शख्स ही यहां पे शैतानों का एक बाप है

हर वक्त यहां पे बड़ा धोखा हुआ मेरे साथ है

अपनों ने लूटा सावन में दिखाकर हाथी दांत है


फिर भी किसी से कोई शिकवा नहीं है, मुझे तो,

खुद के नसीब ने दिया दगा जब बिना बात है

फूलों से ज़्यादा शूलों का लगता सच्चा साथ है

कम से कम दर्द देकर बताते सच्चाई का कांच है


कोई धोखा दे रो मत, कोई विश्वास तोड़े सो मत,

आंख मूंद भरोसे से टूटता दिल बिना आवाज है

फूंक-फूंक कर जो यहां पे सदा कदम रखते है

दुनिया के फ़लक में बनते है,वो सुंदर चाँद है


उनको ही मिलती यहां पे रोशनी की सौगात है

जो अंधेरे को दिखाते है, अपने नुकीले दांत है

दगा देनेवालों से जो रखते दूरी सात हाथ है,

वो कमल बनकर खिलते है, हमेशा दिन-रात है



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy