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Rahul Dwivedi 'Smit'

Tragedy


5.0  

Rahul Dwivedi 'Smit'

Tragedy


देशद्रोह का काम न हो

देशद्रोह का काम न हो

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थूक रहा हूँ देश जाति की, दूषित हुई सियासत पर ।

थूक रहा हूँ घर में पलती, इस जहरीली आफत पर ।


इस भारत में खूनी कुत्तों, को जब मारा जाता है ।

तब गिद्धों की नस्लों वाला, कुनबा भी थर्राता है ।


इन गिद्धों को भारत भू के, सपनों का कुछ भान नहीं ।

और सहादत शांति सुरक्षा, का बिलकुल भी ज्ञान नहीं ।


इनको तो कुत्तों की लाशों, पर चिल्लाना आता है ।

राजनीति की खातिर हद से, तक गिर जाना आता है ।


लानत देता हूँ मैं ऐसे, घर में छुपे सियारों को ।

लानत देता हूँ आतंकी, नस्लों के मक्कारों को ।


लानत है जिनको वीरों की, नहीं शहादत दिखती है ।

जिनको केवल आतंकी की, खस्ता हालत दिखती है ।


थूक रहा हूँ उन लोगों पर, जो भारत को छलते हैं ।

और सहादत तक पर कायर, रोज सियासत करते हैं ।


थूक रहा हूँ उन पर जिनको, संविधान का ज्ञान नहीं ।

जिनके मन में भारत माँ का, मान नहीं सम्मान नहीं ।


जिनका दिल इस भारत माँ का, मान नही रख सकता है ।

जिनका मन सच्चे वीरों का, ध्यान नहीं रख सकता है ।


जो वीरों के कटे सरों पर, मौन नहीं तज पाते हैं ।

और दुश्मनों की लाशों पर, आँसू खूब बहाते हैं ।


ऐसे सत्ता पर बैठे कुछ, दुश्मन अब तक जिन्दा हैं ।

वीर जवानों की रूहें इस, हालत पर शर्मिंदा हैं ।


जिनकी खातिर मिटे वहीं दुश्मन की भाषा रटते हैं ।

कैसे खुद को भारतवासी, निर्लज्जी कह सकते हैं ।


जब आतंकी आते हैं तब, उनसे लड़ना होता है ।

मगर देश के गद्दारों से, रोज निपटना होता है ।


जिन्हें भगत आजाद देश में, आतंकी दिख जाते हैं ।

उनको पाकिस्तानी दुश्मन, भाई जैसे भाते हैं ।


आज देश के सच्चे वीरों, की भाषा में कहता हूँ ।

और देश के पहरेदारों से उम्मीदें करता हूँ ।


जो सेना पर प्रश्न उठाये, उसको हक क्या जीने का ।

जिनको मतलब समझ न आता, छप्पन इंची सीने का ।


देश द्रोह जब संविधान में, सजापात्र कहलाता है ।

फिर कैसे सत्ता पर बैठा, हर कपटी बच जाता है ।


पहले आगे आकर हमको, देशद्रोह समझाओ तो ।

लिखित रूप से देशद्रोह की, परिभाषा बतलाओ तो ।


जिससे भारत में फिर कोई, देशभक्ति बदनाम न हो ।

घर में रहने वालों से फिर, देशद्रोह का काम न हो ।


सरहद पर मिटने वालों को, खुद पर होता नाज रहे ।

स्वाभिमान से और फक्र से, जिन्दा हर जाँबाज रहे ।


बहुत हुआ आतंकवाद का, महिमामण्डन बन्द करो ।

न्याय और सेना का ऐसे, करना खण्डन बन्द करो ।


कातिल का साथी भी जैसे, कातिल ही कहलाता है ।

वैसे आतंकी का प्रियतम, आतंकी हो जाता है ।


फिर उनको क्यों फाँसी देने, से घबराना मोदी जी !

जिनको नहीं पचा आतंकी, का मर जाना मोदी जी !


यदि कोई आतंकवाद की, बात करे तो फाँसी दो ।

भारत की सुचिता से कोई, घात करे तो फाँसी दो ।


नेता हो या आम नागरिक, हर मुजरिम को फाँसी दो । 

देशद्रोह सी बात करे जो, उस हाकिम को फाँसी दो ।


आतंकी का धर्म न पूछो, सीधे गोली मारो तुम ।

फिर जो प्रश्न करे उसको भी, सरेआम ललकारो तुम ।


जेल भरो सत्ता पर बैठे, आतंकी आकाओं से ।

जिससे कोई खेल न पाए, फिर शहीद के घावों से ।


अगर शहादत सस्ती लगती, अपने भी बच्चे भेजे।

सरहद पर अपने घर वाले, देशभक्त सच्चे भेजे ।


सच कहता हूँ हर शहीद का, मोल समझ तब आएगा ।

अंगेजों का भीख दिया वह, शीश तभी कट पायेगा ।



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