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मधुलिका साहू सनातनी

Tragedy Classics Crime

4.5  

मधुलिका साहू सनातनी

Tragedy Classics Crime

डरती हूँ

डरती हूँ

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9

मुझे डर लगता है
कभी आठ माह की बच्ची
के रूप में
कभी अस्सी वर्ष की
वृद्धा के रूप में
कहीं कोई शैतान
कोई आतंकी
कोई आतातायी
न आ जाये
और शील हरण न करके
देह न फेंक दे
किसी गटर में
कभी शीश काट
कभी जला कर
या कोई गोली
न उतार दे
शरीर क्षत विक्षत कर
डरती हूँ कि
मेरी हत्या होने पर भी
मैं आवाज कैसे उठाऊँ
इस सेक्युलर देश मे
क्योकि कुछ लोग
डरे हुए हैं
और डर डर कर
रेप हत्याएँ कर रहे हैं
क्योकि कुछ डरे हुए
सबके सीने पर चढ़कर
किसी रिंकू  तरुण कमलेश के पीठ में
(वैसे तो नाम अनेक हैं )
चाकू घोंप रहे हैं
मैं डरती हूँ
उन बेचारों के
डर को देखकर
अब तो दुनियाँ के
हर देश मे
डर उनका छलक रहा
यही देख मैं भी
डरने लगी हूँ



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