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Mayank Kumar 'Singh'

Classics

5.0  

Mayank Kumar 'Singh'

Classics

डर

डर

1 min
320


डर लगता है जज्बात से

डर लगता है उम्मीद से

डर लगता है बे नसीबी से

डर लगता है तसल्लियों से।


डर लगता है

अपने ही साथियों से

डर लगता है उमंग से

क्यों ? डर लगता है

चलते दृढ़ पथों से।


डर लगता हैं हालात से

पूछो डर से !

क्या खुद डर लगता

उसे अपने से भी

अजीब है यह डर

क्यों लगता हम सबों को डर !


जब खुद नहीं डरता डर !

तो क्यों हमें लगता है डर ?

शायद कायरता हैं डर

शायद जीवन का अंग है डर।


शायद असफलता है डर

शायद कुछ करने की आस है डर

होना चाहिए भी "डर"

क्योंकि आलस्य को भगाता है डर।


दुखों में कुछ करने को उकसा हैं डर

अगर डर न होता

फिर वाल्मीकि न होते

डर न होता

फिर आदर्श न होते !


डर न होता

फिर रामायण,

गीता, कुरान न होते !


हां तो कठोर बन

लड़ो डर से क्योंकि

संभालना जीना सीखाता ये डर !


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