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Devendraa Kumar mishra

Romance

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Devendraa Kumar mishra

Romance

ढ़ाई अक्षर प्रेम के

ढ़ाई अक्षर प्रेम के

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मैं बूंद तुम सागर 

मैं अपढ़ तुम आखर 

मैं धूल तुम फ़ूल 

तुम जो कहो, सब कुबूल 

मैंने जाना है तुमसे 

ढ़ाई अक्षर प्रेम के 

यही ढ़ाई अक्षर मेरा जीवन है 

तुम्हीं धरती, तुमसे मेरा नील गगन है 

तुम हो तो ये चमन है 

तुम्हारे बिना सब उजाड़ वन है 

तुम तुलसी मेरे आँगन की 

तुम बारिश हो सावन की 

तुम भावन हो मेरे मन की 

तुम्हारे बिना जीवन जैसे 

अनपढ़ के लिए अक्षर ज्ञान के 

दिया मैं, बाती तुम 

गीत मैं, गाती तुम 

अक्षर मैं, प्रेम पाती तुम 

मेरे जीवन में साथी तुम 

तुम मुझमे, मैं तुममें 

तुम और मैं होते हम 

सीप मैं, स्वाति तुम 

मेरे लिए मोती तुम प्रेम के 

मेरे ढ़ाई अक्षर प्रेम के. 



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