STORYMIRROR

Nalanda Satish

Tragedy Action Inspirational

3  

Nalanda Satish

Tragedy Action Inspirational

दावपेंच

दावपेंच

1 min
196

कपूत ही बेचते हैं पुरखो की दौलत 

सपूत इस कला मे माहिर नहीं होते 


खुद ही खाक कर डालते हैं लगाकर आग आशियाना अपना 

हुक्मरानो की साजिशो के गवाहदार नही होते


तुम्हारी सोच के परे है नजरें उनकी

सियासत के दावपेच अकेले नहीं होते 


खामोश शहरों में चमकती है समशिरे 

काफिलो के दरम्यान दंगे नहीं होते 


होती है कानाफुसी दबी हुई आवाज में 

आइनों के यहाँ राजदार नहीं होते 


राशन की सस्ती दुकानों मे देखी लंबी कतारे 

पर छोटे पंछियों में उड़ान के हौसले नहीं होते 


दाने डालकर जाल बिछा गया शिकारी 

अब सिवाय कटने के कोई और बहाने नहीं होते 


समझ सको तो समझलो जहाँवालो वक्त अब भी गुजरा नहीं 

कल मत कहना वक्त के निशां नहीं होते !




विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Nalanda Satish

Similar hindi poem from Tragedy