STORYMIRROR

Nalanda Satish

Abstract Tragedy

4  

Nalanda Satish

Abstract Tragedy

सैलाब

सैलाब

1 min
479

पत्थरो ने अपना काम कर दिया ठोकरे खिलाकर

तुम्हारी नासमझी इस कदर सिर चढ़ी तो क्या दोष तकदीर का


चक्रव्यूह रचाकर काम कर दिया दुश्मनो ने

तोड़कर इसे बाहर न निकल सके तो क्या दोष मुकद्दर का


शाबाशी और खंजर पीठ पर ही करते है वार

शक्कर और नमक का फर्क समझ न सके तो क्या दोष पानी का


सिकुड़ जाती है आँखो की पुतलियाँ रो-रोकर 'नालन्दा'

असन्तोष और बगावत का फर्क न समझ सके 

तो क्या दोष सैलाब का।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Nalanda Satish

Similar hindi poem from Abstract