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Dipanshu Asri

Tragedy


4.5  

Dipanshu Asri

Tragedy


चरस

चरस

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दम भर के आँखों को मीच के 

इस दुनिया से मैं तर जाऊ 

मैं कैसा युवा हूँ आज का ?

छोटी बातों से घबराऊँ 


नींद नहीं है , ना चैन है मुझको 

दो कश्त लगाकर मैं गाऊं 

कल की मुझको होश कहा हैं ?

कैसे खुद को मैं समझाऊं ?


ज़िन्दगी का अर्थ मैं क्या समझूँ?

कैसे खुद से ही लड़ जाऊं ?

चरस का मज़ा भी कोई सज़ा है

घर बैठे ज़न्नत को दिखाऊं 


यार दोस्त सब आते हैं अक्सर 

पूछते है मुझसे क्या माल है अंदर ?

हर किसी को लत मैं लगा जाऊं 

कैसा ये खुद ही जाल बुना हैं , कैसे मैं खुद को समझाऊं ?

 

सोचो मत ये तो खुल्ला है धंधा 

ख़ास क्या ? लेता हैं हर आम भी बंदा 

दोष किसका हैं मैं कैसे जानू ?

मैं ग़लत हूँ मैं ये कैसे मानू ?


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