चलो कहानी बुनते हैं
चलो कहानी बुनते हैं
चलो रास्ते में कहानी बुनते हैं
धागे रेशम के कुछ सूत के चुनते हैं
हर बुनाई मिसाल रखती हो जहाँ
इस उधेड़ बुन को साथ में सिलते हैं
दिन की सरगोशी से शाम की थकान तक
चलती दौड़ में थककर
बन पसीना छलकते हैं
फिर सींच कर कलम की क्यारी को
एक नया काग़ज़ी बाग खिलाते हैं
कुछ सुख कभी नाराज़गी शिकवा
हर दिन की आपबीती समझ कर
अपने आप ही से उलझ कर जब
कभी चुप कभी आपा खो बैठते थे
वो बारीक उलझनों को सुलझा के
कुछ नख़रे दिखा के कुछ छोड़ के
आँखों से दिल के दर्द सुनते हैं
तेरे हर नख़रे को दिल में रख कर
चेहरे की चमक को निहारते हैं
गालों की लाली देख थोड़ा शर्माते हैं
गहरे सागर के तल में सीप की तरह
मन में दबे एहसासों को निकल कर
इक दूजे की खामियाँ नहीं ख़ूबी ढूँढते हैं
रस्ते में सुकून वाली मोहब्बत के
बाग खिला कर दूर तक महकाते हैं
प्यार की राह पर रेशमी मिसाल बन
सैंकड़ो मील लंबा सफ़र तय करते हैं
इस सफ़र के हर पत्थर की
धूल मिट्टी की
मखमली घास की
तेज धूप की
घनी छाँव की
घूमते मोड़ की
सलेटी सड़क की
दास्तान सुनते हैं,
चलो रस्ते में कहानी बुनते हैं।
