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Nitu Mathur

Romance Classics Fantasy

4  

Nitu Mathur

Romance Classics Fantasy

यादों की बूंदे

यादों की बूंदे

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जाने हवा कैसे छू गई चेहरे को 

लहरा गई गोल घुंघराले बालों को 

जो कुछ नम कुछ इत्र से गीले थे 

भीनी खुशबू महका गई गालों को 


आँखों से पलकें उठती ढूँढती इधर उधर 

आरसी में देखती शरमाती इस कदर 

शायद मौसम में प्यार अभी बरकरार है 

दिल को छूकर नैनों को देता करार है 


अब ये बरसती बूंदे क्या कह रही हैं 

कैसे मन के तारों को छेड़ रही है 

ख़ुद किसी की याद में बरस रही हैं 

या मुझे कुछ याद दिला रही है


इन बूंदों का कुछ मक़सद तो ज़रूर है 

जन की आस ज़मीं की प्यास बुझा रही है 

ये सीप में मोती ताल में कमल खिला रही है 

ये हवा भीनी सिली सुगंध महका रही है 


बीते पलों का रश्क हो या आगे की फिकर 

वो नन्ही ख़ुशी जिसे महसूस ही नहीं किया 

वो लोग बहुत जो भाते थे चाय पे बतियाते थे

जिनके जिक्र से फ़िक्र मिट जाती थी 

ये हवा उन्हीं पलों का नज़ारा दिखा रही है 


ये मिलन है बिरहा भी सादगी सा रोमांच भी 

आशिकों की शायरी में मुहब्बत के दर्द में 

हर सुनहरे गीत की लड़ियों में इनके निशां हैं 

ये हवा ये बूँदें फिर से वही महफ़िल सजा रही है


अपने अधरों से मीठी बांसुरी बजा रही हैं 

यादों की ये बूंदे कमाल दिखा रही हैं।


~नीतू माथुर


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