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अजय '' बनारसी ''

Abstract

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अजय '' बनारसी ''

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चक्रव्यूह

चक्रव्यूह

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भेदना चाहता हूँ

चक्रव्यूह को

प्रयत्नशील हूँ निरन्तर 

प्रयत्न जारी है

सोचता हूँ

सभी का हालचाल

पूछ लूं किन्तु

मनःस्थिति कुछ

करने का संकेत नहीं दे रही

यह रोग व्यक्तिगत है

सार्वजनिक नहीं कर सकता

हृदयाचाप बढ़ घट रहा

चक्रव्यूह में।


तलवारों की कोलाहल

तीरों से निकल रही चींखें

मुझे डरा रही हैं 

अनवरत

प्रतिदिन

बिस्तर पर जब

आंख मूँदता हूँ

तो 

युद्ध विराम के शंखनाद 

की ध्वनि, आँखों को

धीमे-धीमे बोझिल करती है।


फ़िर सुबह

आँख खुलते ही

चक्रव्यूह में

घिर जाता हूँ

जैसे घिरा है 

मेरे देश का प्रत्येक

साधारण आदमी

मैं भी घिरा हूँ उनके साथ।


सभी बुद्धिमान हैं

इसलिये नहीं तोड़ना 

चाहते चक्रव्यूह को 

साथ मिलकर

अति बुद्धिमता में प्रायः

स्वार्थ छिप जाता है।


इसीलिये

हम सभी

प्रतिदिन

युद्धविराम के शंखनाद से

प्रात के घिरने के क्रम में

प्रतीक्षा करते हैं घेरे जाने का

इस अमानवीय

चक्रव्यूह में।



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