चाँद और इश्क
चाँद और इश्क
चाँद से दुआ कीजिए , वो रोज आ - जाया करे
बादलों के घूँघट में रह कर , रोज न शरमाया करे
न जाने कितनों को इंतजार रहता
चाँदनी रात को मिलना भी तो जरूरी होता है
ऐ चाँद, कभी तो इशारों को समझ जाया करो
डर जाती है वो जिनसे इश्क मुझे है
डर जाती है वो जिनसे इश्क मुझे है
दबे पांव आती है वो , नजरे सबसे बचा के
थोड़ा रोशनी उसे भी दे आया करो
ख्याल करते है रोज लोग ,
कभी तो दिन में भी दिख जाया करो
मिल न पते है लोग अपने महबूब से
काली रात को और न काला बनाया करो
कभी तो बिन चाँदनी रात के दिख जाया करो
हम तो शायर है जनाब
हमारी बातों का कुछ ओर न मतलब निकाला करो
कभी तो चाँद और इश्क के बीच न आया करो |

