STORYMIRROR

Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama

4  

Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama

बुरा ख़्वाब

बुरा ख़्वाब

1 min
167

एक दिन अचानक मेरी तो नींद ही खुल गई

ख्वाब देखा ऐसा की मेरी तो जान ही निकल गई


ख़्वाब में देखा कि मेरी तो दोस्ती ही टूट गई

ये देखते ही मेरे मुंह से तो आह निकल गई


फंसा गया था ख़्वाब में ऐसे जाल में

किसी की झूठी मोहब्ब्त के ख़्वाब में


आईने को देखते देखते ही मेरी तो

तस्वीर ही बदसूरत हो गई


वो ख़्वाब था,पर लगा हमें हकीकत,

उस रात के ख़्वाब में, उस बेवफा की याद में


ख्वाबो ही ख्वाबो में मेरी तो सांस ही निकल गई

वो ख़्वाब था, ये बहुत अच्छा था


गर वो हक़ीक़त का फसाना होता, ये सोचकर ही

इस दिल की तो सारी हेकड़ी ही निकल गई।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Drama