बरसात"
बरसात"
आषाढ़ के पहले बादल,
जब उमड़ घुमड़ आते हैं।
प्यासी सूखी धरा पर
रिमझिम , बरसते हैं।
धरा पानी की बूंदो को
आंचल में समा लेती है।
बरसात में भीग कर
प्रकृति झूम उठती है।
बिखर जाती है,
एक सौंधी सी सुगंध।
मिट्टी और पानी के,
मिलन की सुगंध।
बादल जब बरसते हैं ,
किसान खुश हो जाते हैं।
बहती है शीतल मंद पवन
झूम उठता है कण कण
मानव किन्नर यक्ष
सबके,
मन डोल जाते हैं।
तुलसी के राम भी
बादल की गर्जन से,
सीता बिन
डर जाते हैं।
कालिदास के यक्ष,
मेघदूत से,
प्रिया को
पाती भिजवाते हैं।
बादल दीवाने हुए,
यहां वहां फिरते हैं।
राह तकते रहो
कहीं और जा बरसते हैं।
नदियां जवां होकर,
सागर से मिलने चल देती हैं
बचपन की बरसात भी,
क्या खूब हुआ करती थी।
गलियों में दोस्तों संग
मौज मस्ती हुआ करती थी।
