STORYMIRROR

Surendra kumar singh

Abstract

4  

Surendra kumar singh

Abstract

आहट तो थी

आहट तो थी

1 min
335

इन सुंदर सम्भावनावों की

विश्वास भी था इनमें

और जीवन की गतिविधियां

साक्ष्य भी हैं

इस विश्वास की।

अब अगर ये सम्भावनाएं

सच में बदल कर

सक्रिय हैं जीवन में तो

आश्चर्य कैसा

विस्मय कैसा।

मनुष्य ही तो बना है मनुष्य

और नियंत्रण में चला गया है

सम्मोहित हो

अपने अदृश्य नियंता के।

प्रक्रति है

और उसकी जीवंतता का

एक प्रमाण है मनुष्य,

उसकी प्रवृत्ति का हमसफ़र

उसकी शास्वत सुरक्षा में

अगर है तो

आश्चर्य कैसा।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract