STORYMIRROR

Manju Mahima

Classics Others

3.6  

Manju Mahima

Classics Others

बोनसाई : औरत

बोनसाई : औरत

1 min
801


जड़ें तराश-तराश कर,

बोनसाई तो अब बनाए जाने लगे हैं,

औरत तो सदियों पहले ही

बोनसाई बना दी गई थी,

जो अपने गृहस्थी के गमले में

उग तो सकती थी,पर

ऊँची उठ नहीं सकती थी

जो फल तो दे सकती थी,

पर अपनी सुरभि

फैला नहीं सकती थी...

वह बन कर रह गई 

बस घर की सजावट मात्र.

जिसे सुविधानुसार जब चाहे तब,

कहीं भी , कैसे भी सजा दिया जाता है.

जड़े तराश तराश कर

बोनसाई तो अब बनाए जाने लगे हैं,

पर औरत तो सदियों पहले ही

बोनसाई बना दी गई थी|


.




विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics